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mahabharat 12.291.14: परंतु मैंने देखा है कि जो भी कर्म मनुष्य करता है, चाहे वह पुण्य हो या पाप, चाहे वह प्रकट रूप से किया जाए या गुप्त रूप से (और चाहे वह जान-बूझकर किया जाए या अनजाने में), उसका फल अवश्य मिलता है ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 291: पराशरगीता—कर्मफलकी अनिवार्यता तथा पुण्यकर्मसे लाभ  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.291.14 
अहं तु तावत् पश्यामि कर्म यद् वर्तते कृतम्।
गुणयुक्तं प्रकाशं वा पापेनानुपसंहितम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
परंतु मैंने देखा है कि जो भी कर्म मनुष्य करता है, चाहे वह पुण्य हो या पाप, चाहे वह प्रकट रूप से किया जाए या गुप्त रूप से (और चाहे वह जान-बूझकर किया जाए या अनजाने में), उसका फल अवश्य मिलता है ॥14॥
 
But I have observed that whatever action one performs, whether it is pious or sinful, whether it is done openly or secretly (and whether it is done knowingly or unknowingly), it certainly yields its results. ॥14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)