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mahabharat 12.290.23: विवेकशील पुरुष सुख-दुःख को अपने भीतर ही विलीन करके दूसरे मार्ग का अर्थात् मोक्षमार्ग का अनुसरण करता है। वे समस्त संसारी प्राणी जो स्त्री, पुत्र और धन आदि में आसक्त रहते हैं, दूसरे मार्ग का अनुसरण करते हैं; इसलिए वे जन्म-मरण करते रहते हैं॥ 23॥   |   mahabharat अध्याय 12.290: पराशरगीताका आरम्भ—पराशर मुनिका राजा जनकको कल्याणकी प्राप्तिके साधनका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 290: पराशरगीताका आरम्भ—पराशर मुनिका राजा जनकको कल्याणकी प्राप्तिके साधनका उपदेश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.290.23 
सुखदु:खे समाधाय पुमानन्येन गच्छति।
अन्येनैव जन: सर्व: संगतो यश्च पार्थिव:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
विवेकशील पुरुष सुख-दुःख को अपने भीतर ही विलीन करके दूसरे मार्ग का अर्थात् मोक्षमार्ग का अनुसरण करता है। वे समस्त संसारी प्राणी जो स्त्री, पुत्र और धन आदि में आसक्त रहते हैं, दूसरे मार्ग का अनुसरण करते हैं; इसलिए वे जन्म-मरण करते रहते हैं॥ 23॥
 
A prudent man, having dissolved pleasure and pain within himself, follows another path, that is, the path of attaining salvation. All those worldly beings who are attached to women, children and wealth etc. follow a different path; hence they keep on taking birth and dying.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)