vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 290: पराशरगीताका आरम्भ—पराशर मुनिका राजा जनकको कल्याणकी प्राप्तिके साधनका उपदेश
»
श्लोक 21
श्लोक
12.290.21
दुष्कृते सुकृते चापि न जन्तुर्नियतो भवेत्।
नित्यं मन:समाधाने प्रयतेत विचक्षण:॥ २१॥
अनुवाद
विद्वान् पुरुष को जीवन भर पाप या पुण्य में आसक्त नहीं होना चाहिए तथा अपने मन को भगवान् में एकाग्र करने का प्रयत्न करना चाहिए । 21॥
A learned man should not be attached to either sin or virtue throughout his life and should try to concentrate his mind on God. 21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×