श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न  »  श्लोक 94-95
 
 
श्लोक  12.29.94-95 
ययातिं नाहुषं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम।
य इमां पृथिवीं कृत्स्नां विजित्य सहसागराम्॥ ९४॥
शम्यापातेनाभ्यतीयाद् वेदीभिश्चित्रयन् महीम्।
ईजान: क्रतुभिर्मुख्यै: पर्यगच्छद् वसुन्धराम्॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
सृंजय! हमने सुना है कि नहुष के पुत्र राजा ययाति भी जीवित नहीं बच सके थे। उन्होंने समुद्रों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर शम्यपात से पृथ्वी को नापकर यज्ञ वेदियाँ बनवाईं, जिनसे पृथ्वी की शोभा अद्वितीय हो गई। उन वेदियों पर बड़े-बड़े यज्ञ करते हुए उन्होंने सम्पूर्ण भारत भूमि की परिक्रमा की।
 
‘Srunjay! We have heard that even King Yayati, son of Nahusha, could not survive. After conquering the entire earth including the oceans, he measured the earth with Shamyapat and built sacrificial altars, which gave a unique beauty to the earth. Performing major yagyas on those altars, he circumambulated the entire land of India.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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