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श्लोक 12.29.91-92  |
अश्वमेधशतेनेष्ट्वा राजसूयशतेन च।
अददाद् रोहितान् मत्स्यान् ब्राह्मणेभ्यो विशाम्पते॥ ९१॥
हैरण्यान् योजनोत्सेधानायतान् दशयोजनम्।
अतिरिक्तान् द्विजातिभ्यो व्यभजंस्त्वितरे जना:॥ ९२॥ |
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| अनुवाद |
| प्रजानाथ ! सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ करके उन्होंने दस योजन लम्बे और एक योजन ऊँचे सोने के रोहित नामक बहुत से मत्स्य बनाकर ब्राह्मणों को दान कर दिए। ब्राह्मणों द्वारा ले जाने पर जो बच गए, उन्हें अन्य लोगों ने बाँट दिया॥91-92॥ |
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| ‘Prajanaath! After performing hundred Ashvamedha and hundred Rajasuya sacrifices, he made many fish called Rohit of gold, ten yojanas long and one yojana high, and donated them to the Brahmins. Those which were left after the Brahmins took them away, were distributed by other people.॥91-92॥ |
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