श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  12.29.83 
यं दृष्ट्वा पितुरुत्सङ्गे शयानं देवरूपिणम्।
अन्योन्यमब्रुवन् देवा: कमयं धास्यतीति वै॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
‘जब वह अपने पिता के गर्भ से उत्पन्न होकर उनकी गोद में सो रहा था, तब उसका रूप देवताओं के बालकों के समान था। उसे उस अवस्था में देखकर देवता आपस में कहने लगे कि ‘यह मातृहीन बालक किसका दूध पीएगा?’॥ 83॥
 
‘When he was born from the womb of his father and was sleeping in his lap, his appearance was like that of the children of the gods. Seeing him in that state, the gods started talking among themselves, ‘Whose milk will this motherless child drink?’॥ 83॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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