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श्लोक 12.29.77-78  |
एतद् राज्ञो दिलीपस्य राजानो नानुचक्रिरे।
यस्येभा हेमसंछन्ना: पथि मत्ता: स्म शेरते॥ ७७॥
राजानं शतधन्वानं दिलीपं सत्यवादिनम्।
येऽपश्यन् सुमहात्मानं तेऽपि स्वर्गजितो नरा:॥ ७८॥ |
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| अनुवाद |
| राजा दिलीप के इस महान् कार्य का अनुकरण कोई अन्य राजा नहीं कर सकता था। उनके स्वर्ण-आभूषण और सुवर्ण-आभूषणों से विभूषित मतवाले हाथी मार्ग में पड़े रहते थे। जिन लोगों ने सत्यनिष्ठ और महामनस्वी राजा दिलीप के दर्शन किए, उन्होंने स्वर्ग को भी जीत लिया। 77-78 |
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| ‘No other king could emulate this great deed of King Dilip. His golden ornaments and drunken elephants adorned with golden jewellery used to lie on the road. Those who had the darshan of the truthful and great-minded King Dilip, also conquered the heaven. 77-78. |
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