| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न » श्लोक 50 |
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| | | | श्लोक 12.29.50  | स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथा:॥ ५०॥ | | | | | | अनुवाद | | सृंजय! वह साम, दान, दण्ड और भेद इन चारों शुभ नीतियों में अथवा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य इन चारों शुभ गुणों में तुमसे कहीं अधिक श्रेष्ठ था। वह तुम्हारे पुत्र से भी अधिक धर्मात्मा था। जब वह भी मर गया, तो और कौन जीवित रह सकता था? इसलिए तुम्हें अपने मृत पुत्र के लिए शोक नहीं करना चाहिए॥ 50॥ | | | | 'Srunjaya! He was far superior to you in the four auspicious policies of Sama, Dana, Danda and Bhed or in the four auspicious qualities of Dharma, Gyan, Vairagya and Aishwarya. He was even more pious than your son. When he too died, who else could remain alive? Therefore, you should not mourn for your dead son.॥ 50॥ | | ✨ ai-generated | | |
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