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mahabharat 12.29.46-47: प्राचीन काल में महाबली दुष्यंत के पुत्र भरत ने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यमुना के तट पर तीन सौ घोड़े, सरस्वती के तट पर बीस और गंगा के तट पर चौदह घोड़े बाँधे थे और उतने ही अश्वमेध यज्ञ किये थे।* उन्होंने अपने जीवनकाल में एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ किये थे।॥ 46-47॥   |   mahabharat अध्याय 12.29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.29.46-47 
यो बद्‍ध्वा त्रिशतं चाश्वान् देवेभ्यो यमुनामनु।
सरस्वतीं विंशतिं च गङ्गामनु चतुर्दश॥ ४६॥
अश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च।
इष्टवान् स महातेजा दौष्यन्तिर्भरत: पुरा॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
प्राचीन काल में महाबली दुष्यंत के पुत्र भरत ने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यमुना के तट पर तीन सौ घोड़े, सरस्वती के तट पर बीस और गंगा के तट पर चौदह घोड़े बाँधे थे और उतने ही अश्वमेध यज्ञ किये थे।* उन्होंने अपने जीवनकाल में एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ किये थे।॥ 46-47॥
 
‘In ancient times, Bharata, the son of Dushyanta, the son of great power, had, to please the gods, tied three hundred horses on the bank of the Yamuna, twenty on the bank of the Sarasvati and fourteen on the bank of the Ganga and performed the same number of Ashwamedha sacrifices.* In his lifetime he had performed a thousand Ashwamedha and a hundred Rajasuya sacrifices.॥ 46-47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)