श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  12.29.42-43 
न वोढारं धुरं तस्य कश्चिन्मेने प्रजापति:॥ ४२॥
न भूतं न भविष्यं च सर्वराजसु सृंजय।
अन्यत्रौशीनराच्छैब्याद् राजर्षेरिन्द्रविक्रमात्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
सृंजय! प्रजापति ब्रह्मा ने इन्द्र के समान पराक्रमी उशीनर के पुत्र राजा शिबि को छोड़कर भूतकाल या भविष्यकाल के किसी अन्य राजा को शिबि का भार वहन करने योग्य नहीं समझा ॥ 42-43॥
 
'Srunjaya! Prajapati Brahma did not consider any other king of the past or future, except King Sibi, the son of Ushinara, who was as powerful as Indra, to be capable of shouldering the responsibility of Sibi.॥ 42-43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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