श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  12.29.30-31h 
स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथा:॥ ३०॥
अदक्षिणमयज्वानं श्वैत्य संशाम्य मा शुच:।
 
 
अनुवाद
श्वेतपुत्र श्रीजय! वह धर्म, ज्ञान, वैराग्य और धन इन चारों शुभ गुणों में तुमसे श्रेष्ठ था और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक धर्मात्मा था। जब वह भी मर गया, तो अन्यों का क्या होगा? अतः तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो। उसने न तो कोई यज्ञ किया था और न ही कोई दक्षिणा दी थी, अतः उसके लिए शोक मत करो, शान्त रहो।॥30 1/2॥
 
‘Srijay, son of Shvet! He was superior to you in all the four auspicious qualities of Dharma, knowledge, detachment and wealth and was more pious than your son. When he too has died, what about others? Therefore, do not grieve for your son. He had neither performed any sacrifice nor distributed any dakshina, therefore, do not grieve for him, be calm.॥ 30 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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