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mahabharat 12.29.145: ‘सृंजय! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो? हे राजन! तुम मेरी बात क्यों नहीं सुन रहे? जैसे मरते हुए मनुष्य पर विधिपूर्वक प्रयोग की गई औषधि भी व्यर्थ हो जाती है, वैसे ही क्या मेरा यह सारा प्रवचन व्यर्थ हो गया?’॥145॥   |   mahabharat अध्याय 12.29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.29.145 
किं वा तूष्णीं ध्यायसे सृंजय त्वं
न मे राजन् वाचमिमां शृणोषि।
न चेन्मोघं विप्रलप्तं ममेदं
पथ्यं मुमूर्षोरिव सुप्रयुक्तम्॥ १४५॥
 
 
अनुवाद
‘सृंजय! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो? हे राजन! तुम मेरी बात क्यों नहीं सुन रहे? जैसे मरते हुए मनुष्य पर विधिपूर्वक प्रयोग की गई औषधि भी व्यर्थ हो जाती है, वैसे ही क्या मेरा यह सारा प्रवचन व्यर्थ हो गया?’॥145॥
 
‘Srunjay! What are you silently thinking about? O King! Why are you not listening to me? Just as a medicine used properly on a dying man is of no use, has this entire discourse of mine gone in vain?’॥ 145॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)