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mahabharat 12.29.125-126: बुद्धिमान राजा रन्तिदेव के उस यज्ञ में, अविच्छिन्न अग्नि में आहुति देने के लिए प्रयुक्त होने वाले उपकरण तथा धन संग्रह करने के लिए प्रयुक्त होने वाले उपकरण - घड़े, पात्र, कड़ाहियाँ, हंडियाँ और तवे आदि में से एक भी ऐसा नहीं था जो सोने का न बना हो ॥125-126॥   |   mahabharat अध्याय 12.29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न  »  श्लोक 125-126
 
 
श्लोक  12.29.125-126 
अन्वाहार्योपकरणं द्रव्योपकरणं च यत्॥ १२५॥
घटा: पात्र्य: कटाहानि स्थाल्यश्च पिठराणि च।
नासीत् किंचिदसौवर्णं रन्तिदेवस्य धीमत:॥ १२६॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान राजा रन्तिदेव के उस यज्ञ में, अविच्छिन्न अग्नि में आहुति देने के लिए प्रयुक्त होने वाले उपकरण तथा धन संग्रह करने के लिए प्रयुक्त होने वाले उपकरण - घड़े, पात्र, कड़ाहियाँ, हंडियाँ और तवे आदि में से एक भी ऐसा नहीं था जो सोने का न बना हो ॥125-126॥
 
'In that yagya of the wise king Rantidev, among the instruments used for offering sacrifices in the inevitable fire and the instruments used for collecting money - pitchers, vessels, pans, pots and pans etc., there was not a single one which was not made of gold. 125-126॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)