Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.29.120-121: सृंजय! हमने सुना है कि संकृति के पुत्र राजा रन्तिदेव भी स्वर्गवासी हो गए हैं। उन महातपस्वी राजा ने इंद्र की आराधना करके उनसे वर माँगा कि 'मुझे भरपूर भोजन मिले, मुझे सदैव अतिथियों की सेवा करने का अवसर मिले, मेरी भक्ति कभी नष्ट न हो और मैं किसी से कुछ न माँगूँ।' | mahabharat अध्याय 12.29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
रन्तिदेवं च सांकृत्यं मृतं सृंजय शुश्रुम।
सम्यगाराध्य य: शक्राद् वरं लेभे महातपा:॥ १२०॥
अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि।
श्रद्धा च नो मा व्यगमन्मा च याचिष्म कंचन॥ १२१॥
अनुवाद
सृंजय! हमने सुना है कि संकृति के पुत्र राजा रन्तिदेव भी स्वर्गवासी हो गए हैं। उन महातपस्वी राजा ने इंद्र की आराधना करके उनसे वर माँगा कि 'मुझे भरपूर भोजन मिले, मुझे सदैव अतिथियों की सेवा करने का अवसर मिले, मेरी भक्ति कभी नष्ट न हो और मैं किसी से कुछ न माँगूँ।'
‘Srunjay! We have heard that King Rantidev, son of Sankriti, has also passed away. That great ascetic king, after worshipping Indra, asked for a boon from him that ‘May I have plenty of food, may I always get the opportunity to serve guests, may my devotion never fade away and may I not ask for anything from anyone’.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥