श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न  »  श्लोक 113-114
 
 
श्लोक  12.29.113-114 
लेभे च कामांस्तान् सर्वान् पावकादिति न: श्रुुतम्॥ ११३॥
दर्शैश्च पूर्णमासैश्च चातुर्मास्यै: पुन: पुन:।
अयजद्धयमेधेन सहस्रं परिवत्सरान्॥ ११४॥
 
 
अनुवाद
ऐसा सुना जाता है कि अग्निदेव से उन्हें सभी मनोवांछित फल प्राप्त हुए थे। उन्होंने एक हजार वर्षों तक बार-बार दर्श, पूर्णिमा, चातुर्मास्य और अश्वमेध यज्ञ किये थे।॥113-114॥
 
‘It is heard that he had received all the desired fruits from Agnidev. He had repeatedly performed Darsha, Poornamas, Chaturmasya and Ashwamedha Yajnas for a thousand years.॥ 113-114॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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