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श्लोक 12.29.113-114  |
लेभे च कामांस्तान् सर्वान् पावकादिति न: श्रुुतम्॥ ११३॥
दर्शैश्च पूर्णमासैश्च चातुर्मास्यै: पुन: पुन:।
अयजद्धयमेधेन सहस्रं परिवत्सरान्॥ ११४॥ |
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| अनुवाद |
| ऐसा सुना जाता है कि अग्निदेव से उन्हें सभी मनोवांछित फल प्राप्त हुए थे। उन्होंने एक हजार वर्षों तक बार-बार दर्श, पूर्णिमा, चातुर्मास्य और अश्वमेध यज्ञ किये थे।॥113-114॥ |
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| ‘It is heard that he had received all the desired fruits from Agnidev. He had repeatedly performed Darsha, Poornamas, Chaturmasya and Ashwamedha Yajnas for a thousand years.॥ 113-114॥ |
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