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mahabharat 12.29.112-113h: एक बार अग्निदेव ने उनसे वर माँगने को कहा, तब राजा गय ने यह वर माँगा, 'अग्निदेव! आपके आशीर्वाद से दान करने से मुझे अक्षय धन-संपत्ति का भण्डार प्राप्त हो। धर्म में मेरी श्रद्धा बढ़ती रहे और मेरा मन सदैव सत्य में अनुरक्त रहे।'॥112 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 29: श्रीकृष्णके द्वारा नारद-सृंजय-संवादके रूपमें सोलह राजाओंका उपाख्यान संक्षेपमें सुनाकर युधिष्ठिरके शोकनिवारणका प्रयत्न  »  श्लोक 112-113h
 
 
श्लोक  12.29.112-113h 
यस्मै वह्निर्वरं प्रादात् ततो वव्रे वरान् गय:।
ददतो योऽक्षयं वित्तं धर्मे श्रद्धा च वर्धताम्॥ ११२॥
मनो मे रमतां सत्ये त्वत्प्रसादाद् हुताशन।
 
 
अनुवाद
एक बार अग्निदेव ने उनसे वर माँगने को कहा, तब राजा गय ने यह वर माँगा, 'अग्निदेव! आपके आशीर्वाद से दान करने से मुझे अक्षय धन-संपत्ति का भण्डार प्राप्त हो। धर्म में मेरी श्रद्धा बढ़ती रहे और मेरा मन सदैव सत्य में अनुरक्त रहे।'॥112 1/2॥
 
‘Once Agnidev asked him to ask for a boon, then King Gaya asked for this boon, ‘Agnidev! May I have an inexhaustible storehouse of wealth by donating with your blessings. May my faith in religion keep increasing and may my mind always remain devoted to truth.’॥ 112 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)