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श्लोक 12.29.112-113h  |
यस्मै वह्निर्वरं प्रादात् ततो वव्रे वरान् गय:।
ददतो योऽक्षयं वित्तं धर्मे श्रद्धा च वर्धताम्॥ ११२॥
मनो मे रमतां सत्ये त्वत्प्रसादाद् हुताशन। |
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| अनुवाद |
| एक बार अग्निदेव ने उनसे वर माँगने को कहा, तब राजा गय ने यह वर माँगा, 'अग्निदेव! आपके आशीर्वाद से दान करने से मुझे अक्षय धन-संपत्ति का भण्डार प्राप्त हो। धर्म में मेरी श्रद्धा बढ़ती रहे और मेरा मन सदैव सत्य में अनुरक्त रहे।'॥112 1/2॥ |
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| ‘Once Agnidev asked him to ask for a boon, then King Gaya asked for this boon, ‘Agnidev! May I have an inexhaustible storehouse of wealth by donating with your blessings. May my faith in religion keep increasing and may my mind always remain devoted to truth.’॥ 112 1/2॥ |
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