Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.288.33: जो इस सम्पूर्ण जगत् को अग्नि और सोम (खानेवाला और खाया जानेवाला) रूप में देखता है और अपने को उनसे भिन्न मानता है, उसे माया के अद्भुत भाव - सुख, दुःख आदि स्पर्श नहीं कर सकते। वह पूर्णतया मुक्त है।॥33॥ | mahabharat अध्याय 12.288: अरिष्टनेमिका राजा सगरको वैराग्योत्पादक मोक्षविषयक उपदेश । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अग्नीषोमाविदं सर्वमिति यश्चानुपश्यति।
न च संस्पृश्यते भावैरद्भुतैर्मुक्त एव स:॥ ३३॥
अनुवाद
जो इस सम्पूर्ण जगत् को अग्नि और सोम (खानेवाला और खाया जानेवाला) रूप में देखता है और अपने को उनसे भिन्न मानता है, उसे माया के अद्भुत भाव - सुख, दुःख आदि स्पर्श नहीं कर सकते। वह पूर्णतया मुक्त है।॥33॥
'He who sees this entire world as Agni and Soma (eater and the eaten) and considers himself different from them, cannot be touched by the wonderful emotions of Maya - happiness, sorrow etc. He is completely free.'॥ 33॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥