श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.287.7 
ज्ञाने ह्येवं प्रवृत्ति: स्यात् कार्याणामविशेषत:।
यत् कार्यं न व्यवस्यामस्तद् भवान् वक्तुमर्हति॥ ७॥
 
 
अनुवाद
मुनि! शास्त्रों में अनेक कर्तव्य बताए गए हैं। हम यह निश्चित रूप से निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि इस प्रकार अमुक कर्तव्य करने से हम ज्ञानमार्ग की ओर अग्रसर हो सकते हैं। अतः जो कर्तव्य हमारे लिए है और जिसका हम निर्धारण नहीं कर पा रहे हैं, कृपया उसे हमें बताइए। ॥7॥
 
'Muni! There are many duties mentioned in the scriptures. We are unable to decide specifically that by doing a certain duty in this manner, we can move towards the path of knowledge. Therefore, whatever duty is for us and which we are unable to determine, please tell us that. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)