एवं प्रवर्तमानस्य वृत्तिं प्राणिहितात्मन:।
तपसैवेह बहुलं श्रेयो व्यक्तं भविष्यति॥ ५९॥
अनुवाद
जो मनुष्य इस प्रकार के व्यवसाय का पालन करके जीविका चलाता है और प्राणियों के कल्याण में मन लगाता है, वह मनुष्य स्वधर्मरूपी तप करके इस लोक में प्रत्यक्ष परम कल्याण को प्राप्त होता है ॥59॥
The person who earns his living by following this type of profession and keeps his mind focused on the welfare of living beings, that person will directly attain supreme welfare in this world by performing penance in the form of Swadharma. 59॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि श्रेयोवाचिको नाम सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २८७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रेयोमार्गका प्रतिपादन नामक दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८७॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)