श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.287.47 
कर्मणा यत्र पापेन वर्तन्ते जीवितेप्सव:।
व्यवधावेत् ततस्तूर्णं ससर्पाच्छरणादिव॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जहाँ लोग अपने प्राणों की रक्षा के लिए पापकर्मों से जीविका चलाते हैं, वहाँ से मनुष्य को तुरन्त दूर चले जाना चाहिए, जैसे साँपों से भरे घर से दूर चले जाते हैं ॥47॥
 
Where people earn their living through sinful activities to save their lives, one should immediately move away from that place, just as one would from a house infested with snakes. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)