vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश
»
श्लोक 44
श्लोक
12.287.44
यत्र संलोडिता लुब्धै: प्रायशो धर्मसेतव:।
प्रदीप्तमिव चैलान्तं कस्तं देशं न संत्यजेत्॥ ४४॥
अनुवाद
जहाँ लोभी मनुष्यों ने प्रायः जलते हुए वस्त्र के समान धर्म की मर्यादा का उल्लंघन किया है, उस देश को कौन न त्यागेगा? ॥44॥
Who would not abandon a country where greedy people have often violated the limits of religion like a burning cloth? ॥ 44॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×