श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.287.44 
यत्र संलोडिता लुब्धै: प्रायशो धर्मसेतव:।
प्रदीप्तमिव चैलान्तं कस्तं देशं न संत्यजेत्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जहाँ लोभी मनुष्यों ने प्रायः जलते हुए वस्त्र के समान धर्म की मर्यादा का उल्लंघन किया है, उस देश को कौन न त्यागेगा? ॥44॥
 
Who would not abandon a country where greedy people have often violated the limits of religion like a burning cloth? ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)