श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.287.43 
आकाशस्था ध्रुवं यत्र दोषं ब्रूयुर्विपश्चिताम्।
आत्मपूजाभिकामो वै को वसेत् तत्र पण्डित:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
कौन आत्मसम्मान चाहने वाला मनुष्य ऐसे देश में निवास करेगा जहाँ लोग बिना किसी आधार के विद्वानों पर दोषारोपण करते हैं ॥ 43॥
 
Which person who desires self-respect would live in a country where people definitely accuse learned men without any basis? ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)