Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.287.4: एक समय कल्याण की इच्छा रखने वाले जितेन्द्रिय गालव मुनि ने अपने आश्रम में पधारे हुए देवर्षि नारदजी से, आसक्ति और थकान से रहित, ज्ञान और आनन्द से युक्त तथा मन को वश में करने वाले देवोपम तेजस्वी ब्राह्मण से इस प्रकार पूछा - 4॥   |   mahabharat अध्याय 12.287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.287.4 
स्वाश्रमं समनुप्राप्तं नारदं देववर्चसम्।
वीतमोहक्लमं विप्रं ज्ञानतृप्तं जितेन्द्रिय:।
श्रेयस्कामो यतात्मानं नारदं गालवोऽब्रवीत्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
एक समय कल्याण की इच्छा रखने वाले जितेन्द्रिय गालव मुनि ने अपने आश्रम में पधारे हुए देवर्षि नारदजी से, आसक्ति और थकान से रहित, ज्ञान और आनन्द से युक्त तथा मन को वश में करने वाले देवोपम तेजस्वी ब्राह्मण से इस प्रकार पूछा - 4॥
 
Once upon a time, Jitendriya Galav Muni, desirous of welfare, asked Devopam Tejasvi Brahmin, who was free from attachment and fatigue, full of knowledge and joy and who controlled the mind, Devarshi Naradji, who had come to his ashram, in this way - 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)