श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.287.23 
शब्दरूपरसस्पर्शान् सह गन्धेन केवलान्।
नात्यर्थमुपसेेवेत श्रेयसोऽर्थी कथंचन॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य कल्याण की इच्छा रखता है, उसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध आदि इन्द्रियों में किसी भी प्रकार से अधिक लिप्त नहीं होना चाहिए। ॥23॥
 
A person who desires to attain welfare should not in any way indulge in the senses such as sound, touch, form, taste and smell in excess. ॥23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)