श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.287.21 
अहंकारस्य च त्याग: प्रमादस्य च निग्रह:।
संतोषश्चैकचर्या च कूटस्थं श्रेय उच्यते॥ २१॥
 
 
अनुवाद
अहंकार का त्याग, प्रमाद का निवारण, संतोष और एकांतवास - ये निश्चित लाभ कहे जाते हैं ॥21॥
 
Giving up ego, stopping negligence, contentment and living in solitude - these are called sure benefits. ॥21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)