श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.287.19 
दैवतेभ्य: पितृभ्यश्च संविभागोऽतिथिष्वपि।
असंत्यागश्च भृत्यानां श्रेय एतदसंशयम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
देवताओं, पितरों और अतिथियों को उनका भाग देना तथा जिनका पालन करने योग्य है, उनका परित्याग न करना कल्याण का निश्चित साधन है ॥19॥
 
Giving the gods, ancestors and guests their share and not abandoning those who are capable of being supported is a sure means of welfare. ॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)