श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 287: नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  12.287.15-16 
यत् तु निश्रेयसं सम्यक् तच्चैवासंशयात्मकम्॥ १५॥
अनुग्रहं च मित्राणाममित्राणां च निग्रहम्।
संग्रहं च त्रिवर्गस्य श्रेय आहुर्मनीषिण:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
कल्याण का साधन सर्वथा संशयरहित है। मित्रों पर दया करना, शत्रुता रखने वाले दुष्टों को दण्ड देना तथा धर्म, अर्थ और काम का संग्रह करना - इसे बुद्धिमान पुरुष शुभ कहते हैं॥15-16॥
 
The means of welfare is completely free from doubt. Showing kindness to friends, punishing the wicked who have enmity and collecting Dharma, Artha and Kama – the wise men call this auspicious.॥15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)