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mahabharat 12.286.5: समंगजी बोले - दूसरों का आदर करने वाले देवर्षे! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वरूप और सार जानता हूँ; इसीलिए मेरे मन में कभी दुःख नहीं होता॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.286: समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 286: समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.286.5 
समङ्ग उवाच
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वमेतत् तु मानद।
तेषां तत्त्वानि जानामि ततो न विमना ह्यहम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
समंगजी बोले - दूसरों का आदर करने वाले देवर्षे! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वरूप और सार जानता हूँ; इसीलिए मेरे मन में कभी दुःख नहीं होता॥5॥
 
Samangji said – Devrsha who respects others! I know the nature and essence of the past, present and future; That's why there is never sadness in my mind. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)