श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 286: समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.286.4 
उद्वेगं न हि ते किंचित् सुसूक्ष्ममपि लक्षये।
नित्यतृप्त इव स्वस्थो बालवच्च विचेष्टसे॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मैं तुम्हारे मन में कभी किंचितमात्र भी विकार नहीं देखता। तुम सदैव संतुष्ट रहते हो, अपने स्वरूप में स्थित रहते हो और बालकों के समान आचरण करते हो (इसका क्या कारण है?)॥4॥
 
I never see even the slightest disturbance in your mind. You always remain contented and remain in your own self and act like a child (what is the reason for this?)॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)