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mahabharat 12.286.18: शोक, भय और अभिमान- ये जीवों को सुख-दुःख में डालकर मोह में डालते हैं; अतः जब तक यह शरीर क्रियाशील है, तब तक मैं साक्षीभाव से इन सबको देखता हूँ॥18॥   |   mahabharat अध्याय 12.286: समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 286: समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.286.18 
एतान् शोकभयोत्सेकान् मोहनान् सुखदु:खयो:।
पश्यामि साक्षिवल्लोके देहस्यास्य विचेष्टनात्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
शोक, भय और अभिमान- ये जीवों को सुख-दुःख में डालकर मोह में डालते हैं; अतः जब तक यह शरीर क्रियाशील है, तब तक मैं साक्षीभाव से इन सबको देखता हूँ॥18॥
 
Grief, fear and pride-these delude the living beings by putting them into pleasure and pain; therefore, as long as this body is active, I observe them all as a witness.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)