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mahabharat 12.286.17: प्रिय वस्तु सुखदायी होती है। सुख से अभिमान बढ़ता है और अभिमान से नरक ही प्राप्त होता है। इसलिए मैं इन तीनों का त्याग करता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 12.286: समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 286: समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.286.17 
प्रियं हि हर्षजननं हर्ष उत्सेकवर्धन:।
उत्सेको नरकायैव तस्मात् तान् संत्यजाम्यहम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
प्रिय वस्तु सुखदायी होती है। सुख से अभिमान बढ़ता है और अभिमान से नरक ही प्राप्त होता है। इसलिए मैं इन तीनों का त्याग करता हूँ।
 
A loved object is joyful. Joy increases pride and pride will only lead to hell. Therefore, I renounce these three.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)