Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.286.14: सब प्रकार की वस्तुओं से विरक्त महापुरुष दूसरों से कुछ नहीं चाहता। वह भविष्य में मिलने वाले धन-लाभ का भी स्वागत नहीं करता। वह बहुत-सा धन पाकर भी प्रसन्न नहीं होता और धन के नष्ट हो जाने पर भी दुःखी नहीं होता।॥14॥ | mahabharat अध्याय 12.286: समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
समाहितो न स्पृहयेत् परेषां
नानागतं चाभिनन्देच्च लाभम्।
न चापि हृष्येद् विपुलेऽर्थलाभे
तथार्थनाशे च न वै विषीदेत्॥ १४॥
अनुवाद
सब प्रकार की वस्तुओं से विरक्त महापुरुष दूसरों से कुछ नहीं चाहता। वह भविष्य में मिलने वाले धन-लाभ का भी स्वागत नहीं करता। वह बहुत-सा धन पाकर भी प्रसन्न नहीं होता और धन के नष्ट हो जाने पर भी दुःखी नहीं होता।॥14॥
A great man who is detached from all kinds of things does not want anything from others. He does not even welcome the financial gains that may come in the future. He does not become happy on getting a lot of wealth and does not feel sad even on losing his wealth.॥ 14॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥