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mahabharat 12.286.11: ज्ञान का मूल, जिसकी चर्चा बुद्धिमान लोग करते हैं, इन्द्रियों की पवित्रता है। जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ मोह और शोक में डूबी रहती हैं, उसे ज्ञान का लाभ कभी नहीं मिल सकता। ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 12.286: समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 286: समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.286.11 
यस्मै प्राज्ञा: कथयन्ते मनुष्या:
प्रज्ञामूलं हीन्द्रियाणां प्रसाद:।
मुह्यन्ति शोचन्ति तथेन्द्रियाणि
प्रज्ञालाभो नास्ति मूढेन्द्रियस्य॥ ११॥
 
 
अनुवाद
ज्ञान का मूल, जिसकी चर्चा बुद्धिमान लोग करते हैं, इन्द्रियों की पवित्रता है। जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ मोह और शोक में डूबी रहती हैं, उसे ज्ञान का लाभ कभी नहीं मिल सकता। ॥11॥
 
The root of wisdom, which the wise men talk about, is the purity of the senses. A man whose senses are immersed in delusion and sorrow, can never get the benefit of wisdom. ॥11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)