श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.285.45 
न भवति विदुषां महद्भयं
यदविदुषां सुमहद्भयं भवेत्।
न हि गतिरधिकास्ति कस्यचित्
सकृदुपदर्शयतीह तुल्यताम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
ज्ञानीजन संसार से किंचितमात्र भी भय नहीं पाते, जो अज्ञानियों के लिए महान भय है। ज्ञानीजन न तो अधिक गति को प्राप्त होते हैं, न न्यून गति को, वे सब एक ही गति के भागी होते हैं। 'सकृद्विभतो ह्येष ब्रह्मलोकः' आदि श्रुति यहाँ ज्ञानियों की गतिकी की समानता दर्शाती है। 45॥
 
The wise people do not get even the slightest fear from the world which is a great fear for the ignorant. None of the wise men gets more or less speed—they are all partakers of the same speed. ‘Sakridvibhato Hyesh Brahmalokah’ etc. Shruti here shows the similarity of the dynamics of the knowledgeable people. 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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