श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.285.36 
आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य गुणसर्गेण चेतना।
सत्त्वमस्य सृजन्त्यन्ये गुणान् वेद कदाचन॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
जब बुद्धि सत्त्व आदि गुणों का निर्माण करती है, उस समय आत्मा उसका आश्रय नहीं होता। बुद्धि स्वयं ही अन्य गुणों का निर्माण करती है और आत्मा उन गुणों को कभी नहीं जान पाता ॥36॥
 
When the intellect creates qualities like Sattva, the soul is not its support at that time. The intellect itself creates other qualities and the soul never knows those qualities. ॥ 36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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