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mahabharat 12.285.29: ऐसी स्थिति में यदि शरीर या मन के भीतर किसी प्रकार की प्रसन्नता की अनुभूति हो तो उसे सात्विक अनुभूति समझना चाहिए ॥29॥   |   mahabharat अध्याय 12.285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.285.29 
तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत्।
वर्तते सात्त्विको भाव इत्युपेक्षेत तत् तथा॥ २९॥
 
 
अनुवाद
ऐसी स्थिति में यदि शरीर या मन के भीतर किसी प्रकार की प्रसन्नता की अनुभूति हो तो उसे सात्विक अनुभूति समझना चाहिए ॥29॥
 
In such a situation, if there is any feeling of happiness within the body or mind, then it should be considered as a satvik feeling. 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)