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mahabharat 12.284.96: जो भयंकर, भयानक और भयंकर से भी भयंकर रूप वाले हैं तथा जो शिवस्वरूप हैं, शान्त और परम शान्त स्वरूप हैं, उन भगवान शंकर को मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ॥96॥   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  12.284.96 
अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च।
नम: शिवाय शान्ताय नम: शान्ततमाय च ॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
जो भयंकर, भयानक और भयंकर से भी भयंकर रूप वाले हैं तथा जो शिवस्वरूप हैं, शान्त और परम शान्त स्वरूप हैं, उन भगवान शंकर को मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ॥96॥
 
I repeatedly salute Lord Shankar, who is fierce, terrible and even more fierce than the fiercest form, and who is the form of Shiva, who is peaceful and the most peaceful. ॥96॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)