श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  12.284.95 
नमो रक्तविरक्ताय भावनायाक्षमालिने।
सम्भिन्नाय विभिन्नाय छायायातपनाय च॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
जो आसक्त और विरक्त दोनों रूपों वाले हैं, जो ध्यान में तत्पर हैं, जो रुद्राक्ष की माला धारण करते हैं, जो कारण रूप से सबमें विद्यमान हैं, किन्तु कार्य रूप में पृथक् प्रतीत होते हैं, तथा जो सम्पूर्ण जगत को छाया और धूप प्रदान करते हैं, उन भगवान शंकर को नमस्कार है।
 
Salutations to Lord Shankar, who has the forms of both the attached and the detached, who is devoted to meditation, who wears a Rudraksha garland, who is present in everything as the cause but appears separate in the form of the effect, and who provides shade and sunlight to the entire world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)