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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  12.284.88 
नमो नर्तनशीलाय मुखवादित्रवादिने।
नाद्योपहारलुब्धाय गीतवादित्रशालिने॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
आपका तांडव नृत्य निरंतर जारी रहता है। आप अपने मुख से शंख आदि वाद्य बजाने में कुशल हैं। आप कमल पुष्पों का उपहार पाने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। गायन-वादन में निपुण होने के कारण आप अत्यंत शोभायमान दिखते हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। 88।
 
Your tandava dance continues unabated. You are skilled in playing instruments like the horn etc. with your mouth. You are always eager to receive gifts of lotus flowers. You look very graceful by being adept in the art of singing and playing. I salute you. 88.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)