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mahabharat 12.284.83: आप स्वर्ण उत्पन्न करते हैं, इसलिए आपको हिरण्यगर्भ कहते हैं। आप स्वर्ण कवच और मुकुट धारण करते हैं, इसलिए आपको हिरण्यकवच और हिरण्यचूड़ कहते हैं। आप स्वर्ण के स्वामी हैं। मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ॥ 83॥   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  12.284.83 
नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यकवचाय च।
हिरण्यकृतचूडाय हिरण्यपतये नम:॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
आप स्वर्ण उत्पन्न करते हैं, इसलिए आपको हिरण्यगर्भ कहते हैं। आप स्वर्ण कवच और मुकुट धारण करते हैं, इसलिए आपको हिरण्यकवच और हिरण्यचूड़ कहते हैं। आप स्वर्ण के स्वामी हैं। मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ॥ 83॥
 
Because you produce gold, you are called Hiranyagarbha. Because you wear golden armour and crown, you are called Hiranyakavach and Hiranyachud. You are the lord of gold. I respectfully salute you.॥ 83॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)