श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 72-73
 
 
श्लोक  12.284.72-73 
शतोदर शतावर्त शतजिह्व नमोऽस्तु ते॥ ७२॥
गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किण:।
ब्रह्माणं त्वा शतक्रतुमूर्ध्वं खमिव मेनिरे॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
आपके सैकड़ों उदर, सैकड़ों चक्र और सैकड़ों जिह्वाएँ हैं, अतः आप क्रमशः शतोदर, शतवर्त और शतजिह्वा नामों से प्रसिद्ध हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। गायत्री मंत्र का जाप करने वाले ब्राह्मण आपका गुणगान करते हैं और सूर्यपूजक सूर्य के रूप में आपकी पूजा करते हैं। ऋषिगण आपको ब्रह्मा, शतक्रतु इन्द्र और आकाश के समान सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित मानते हैं।
 
Because you have hundreds of stomachs, hundreds of circles and hundreds of tongues, you are famous by the names Shatodar, Shatavarta and Shatjihva respectively. I salute you. The Brahmins who chant the Gayatri Mantra sing your praises and the Surya-worshippers worship you in the form of the Sun. The sages consider you to be the highest position like Brahma, Shatakratu Indra and the sky.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)