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mahabharat 12.284.70: आप सहस्राक्ष हैं क्योंकि आपके हजारों नेत्र हैं। आपकी इन्द्रियाँ अत्यंत विलक्षण हैं, अर्थात् वे आपको अदृश्य वस्तुओं को भी देखने में समर्थ बनाती हैं, इसीलिए आपको विरुपाक्ष कहते हैं। आप त्र्यक्ष हैं क्योंकि आपके तीन नेत्र हैं। आप यक्षराज कुबेर के इष्टदेव भी हैं। आपके चारों ओर हाथ-पैर हैं तथा चारों ओर नेत्र, सिर और मुख हैं। 70।   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  12.284.70 
सहस्राक्ष विरूपाक्ष त्र्यक्ष यक्षाधिपप्रिय।
सर्वत:पाणिपादान्त सर्वतोऽक्षिशिरोमुख॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
आप सहस्राक्ष हैं क्योंकि आपके हजारों नेत्र हैं। आपकी इन्द्रियाँ अत्यंत विलक्षण हैं, अर्थात् वे आपको अदृश्य वस्तुओं को भी देखने में समर्थ बनाती हैं, इसीलिए आपको विरुपाक्ष कहते हैं। आप त्र्यक्ष हैं क्योंकि आपके तीन नेत्र हैं। आप यक्षराज कुबेर के इष्टदेव भी हैं। आपके चारों ओर हाथ-पैर हैं तथा चारों ओर नेत्र, सिर और मुख हैं। 70।
 
You are Sahasraksha because you have thousands of eyes. Your senses are the most extraordinary, that is, they make you see even the invisible objects, that is why you are called Virupaksha. You are called Tryaksha because you have three eyes. You are also the favourite (Ishtadev) of Yaksharaj Kuber. You have hands and feet on all sides and eyes, head and face on all sides. 70.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)