श्राविते च मखाध्याये देवानां गुरुणा तत:॥ ६०॥
तमुवाचाञ्जलिं कृत्वा दक्षो देवं प्रजापति:।
भीतशङ्कितवित्रस्त: सबाष्पवदनेक्षण:॥ ६१॥
यदि प्रसन्नो भगवान् यदि चाहं भवत्प्रिय:।
यदि वाहमनुग्राह्यो यदि वा वरदो मम॥ ६२॥
यद् दग्धं भक्षितं पीतमशितं यच्च नाशितम्।
चूर्णीकृतापविद्धं च यज्ञसम्भारमीदृशम्॥ ६३॥
दीर्घकालेन महता प्रयत्नेन सुसंचितम्।
तन्न मिथ्या भवेन्मह्यं वरमेतमहं वृणे॥ ६४॥
अनुवाद
उस समय देवगुरु बृहस्पति ने महादेव को वेद का प्रथम भाग पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात् प्रजापति दक्ष ने हाथ जोड़कर, नेत्रों से अश्रुधारा बहाते हुए, मानो भय और संशय से भयभीत होकर कहा - 'प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, यदि मैं आपका प्रिय हूँ, यदि मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ अथवा आप मुझे वर देने को इच्छुक हैं, तो मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि मैंने दीर्घकाल तक बड़े यत्न से यज्ञ के लिए जो कुछ एकत्र किया है, जो कुछ जलाया गया, खाया गया, नष्ट किया गया अथवा टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिया गया, वह मेरे लिए व्यर्थ न जाए।'
At that time, Devaguru Brihaspati read out the first part of the Veda to Mahadeva. Thereafter, Prajapati Daksh, with folded hands and tears flowing from his eyes, said as if he was frightened by fear and doubt - 'Lord! If you are pleased with me, if I am your favourite, if I am deserving of your grace or if you are willing to grant me a boon, then I ask for this boon that whatever I had collected for the yagya after a long time and with great efforts, whatever was burnt, eaten, destroyed or thrown away after being crushed into pieces, should not be wasted for me.'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥