श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  12.284.55 
शरणं गच्छ विप्रेन्द्र देवदेवमुमापतिम्।
वरं क्रोधोऽपि देवस्य वरदानं न चान्यत:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण! तुम सब देवताओं के स्वामी उमावल्लभ भगवान शिव की शरण में जाओ। महादेवजी का क्रोध भी अत्यंत शुभ है और दूसरों से प्राप्त आशीर्वाद भी शुभ नहीं होता।॥55॥
 
Brahmin! You should seek refuge in the lord of all the gods, Umavallabh Lord Shiva. Even Mahadevji's anger is extremely auspicious and even blessings received from others are not auspicious. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)