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mahabharat 12.284.52-53h: मैं यहाँ एकत्रित हुए महान ब्राह्मणों को देखने या इस यज्ञ का तमाशा देखने के लिए कौतूहलवश नहीं आया हूँ। तुम्हें यह जान लेना चाहिए कि मैं यहाँ केवल तुम्हारे इस यज्ञ का विध्वंस करने आया हूँ।   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 52-53h
 
 
श्लोक  12.284.52-53h 
द्रष्टुं वा नैव विप्रेन्द्रान् नैव कौतूहलेन वा॥ ५२॥
तव यज्ञविघातार्थं सम्प्राप्तं विद्धि मामिह।
 
 
अनुवाद
मैं यहाँ एकत्रित हुए महान ब्राह्मणों को देखने या इस यज्ञ का तमाशा देखने के लिए कौतूहलवश नहीं आया हूँ। तुम्हें यह जान लेना चाहिए कि मैं यहाँ केवल तुम्हारे इस यज्ञ का विध्वंस करने आया हूँ।
 
I have not come here to see the great brahmins who have gathered here or to see the spectacle of this sacrifice out of curiosity. You should know that I have come here only to destroy this sacrifice of yours.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)