श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  12.284.46 
पानकानि च दिव्यानि लेह्यचोष्याणि यानि च।
भुञ्जते विविधैर्वक्त्रैर्विलुम्पन्त्याक्षिपन्ति च॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
वहाँ जो भी दिव्य पेय, लेह्य, चोष्य आदि अन्न उपलब्ध थे, उन सबको वे रुद्र अपने विभिन्न मुखों द्वारा खाने, नष्ट करने, छिड़कने और सब दिशाओं में फेंकने लगे ॥ 46॥
 
Whatever food was available there, such as divine drinks, lehya, choshya etc., those Rudras began to eat, destroy, sprinkle and throw all of them in all directions through their various mouths. ॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)