श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.284.43 
विशीर्यमाणा दृश्यन्ते तारा इव नभस्तले।
दिव्यान्नपानभक्ष्याणां राशय: पर्वतोपमा:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
उनके बिखरे हुए टुकड़े आकाश में बिखरे हुए तारों के समान प्रतीत हो रहे थे। उस यज्ञभूमि में जगह-जगह पर्वतों के समान दिव्य भोजन, पेय और खाद्य पदार्थों के ढेर दिखाई दे रहे थे। 43।
 
Their scattered pieces looked like stars scattered across the sky. Here and there in that sacrificial ground, heaps of divine food, drinks and eatables like mountains were visible. 43.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)