श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.284.41 
प्रहरन्त्यपरे घोरा यूपानुत्पाटयन्ति च।
प्रमर्दन्त तथा चान्ये विमर्दन्ति तथा परे॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
अन्य भयंकर भूत यज्ञ-सभाओं को पीटने लगे। कुछ ने यज्ञ-सामग्री को उखाड़ना शुरू कर दिया। अनेक रुद्र यज्ञ-सामग्री को कुचलने और रौंदने लगे।
 
Other fierce ghosts began to beat the members of the yajna. Some began to uproot the yajna. Many Rudras began to crush and trample the materials of the yajna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)