श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  12.284.4-5 
गन्धर्वाप्सरसाकीर्णे नानाद्रुमलतावृते।
ऋषिसङ्घै: परिवृतं दक्षं धर्मभृतां वरम्॥ ४॥
पृथिव्यामन्तरिक्षे च ये च स्वर्लोकवासिन:।
सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा उपतस्थु: प्रजापतिम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वह स्थान गन्धर्वों और अप्सराओं से परिपूर्ण था। वहाँ चारों ओर नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं के समूह फैले हुए थे। पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ प्रजापति दक्ष ऋषियों के समूह से घिरे हुए बैठे थे। उस समय पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग के निवासी भी वहाँ एकत्रित थे और वे सभी हाथ जोड़कर प्रजापति को प्रणाम करके उनकी सेवा में खड़े थे।
 
That place was full of Gandharvas and Apsaras. Various groups of trees and creepers were spread all around there. Prajapati Daksh, the best among the virtuous, sat surrounded by the group of sages. At that time, the inhabitants of the earth, space and heaven were also gathered there and all of them were standing in his service after bowing to Prajapati with folded hands.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)