श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.284.3 
वैशम्पायन उवाच
पुरा हिमवत: पृष्ठे दक्षो वै यज्ञमाहरत् ।
गङ्गाद्वारे शुभे देशे ऋषिसिद्धनिषेविते॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन जी बोले, 'प्राचीन काल की बात है, हिमालय के पार्श्व में स्थित गंगाद्वार (हरिद्वार) की पावन भूमि पर, जहाँ ऋषि-मुनि और सिद्ध पुरुष निवास करते हैं, प्रजापति दक्ष ने अपना यज्ञ आयोजित किया था।
 
Vaishmpayana said, 'It is a story of ancient times, in the auspicious land of Gangadwar (Haridwar) situated on the side of the Himalayas, where the sages and accomplished men reside, Prajapati Daksha had organised his yajna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)